Awargi Shayari ( 36 )


Awargi Shayari
  • Nov 9, 2017   |   Review 151   |  

    पहले इस में इक अदा थी नाज़ था अंदाज़ था रूठना अब तो तिरी आदत में शामिल हो गया

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 337   |  

    कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म मेरे बिस्तर में ये तलवारें कहाँ से आ गईं

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 170   |  

    रिश्तों का ए'तिबार वफ़ाओं का इंतिज़ार हम भी चराग़ ले के हवाओं में आए हैं

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 146   |  

    देखिए पार हो किस तरह से बेड़ा अपना मुझ को तूफ़ाँ की ख़बर दीदा-ए-तर देते हैं

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 129   |  

    हम-सफ़र रह गए बहुत पीछे आओ कुछ देर को ठहर जाएँ

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 381   |  

    गुल आते हैं हस्ती में अदम से हमा-तन-गोश बुलबुल का ये नाला नहीं अफ़्साना है उस का

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 125   |  

    दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले हम को तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 324   |  

    कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 281   |  

    न अब वो शिद्दत-ए-आवारगी न वहशत-ए-दिल हमारे नाम की कुछ और शोहरतें भी गईं

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 385   |  

    आप के जाते ही हम को लग गई आवारगी आप के जाते ही हम से घर नहीं देखा गया

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 345   |  

    उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 123   |  

    तू बू-ए-गुल है और परेशाँ हुआ हूँ मैं दोनों में एक रिश्ता-ए-आवारगी तो है

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 150   |  

    हम को आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब कोई इम्काँ ही नहीं लौट के घर जाने का

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 114   |  

    ज़ेहन की आवारगी को भी पनाहें चाहिए यूँ न शम्ओं को किसी दहलीज़ पर रख कर बुझा

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 379   |  

    लोगो भला इस शहर में कैसे जिएँगे हम जहाँ हो जुर्म तन्हा सोचना लेकिन सज़ा आवारगी

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 374   |  

    लाएगी गर्दिश में तुझ को भी मिरी आवारगी कू-ब-कू मैं हूँ तो तू भी दर-ब-दर हो जाएगा

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 137   |  

    होंटों को रोज़ इक नए दरिया की आरज़ू ले जाएगी ये प्यास की आवारगी कहाँ

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 132   |  

    हमारी मुफ़्लिसी आवारगी पे तुम को हैरत क्यूँ हमारे पास जो कुछ है वो सौग़ातें तुम्हारी हैं

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 150   |  

    अजीब फ़ुर्सत-ए-आवारगी मिली है मुझे बिछड़ के तुझ से ज़माने का डर नहीं है कोई

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 245   |  

    मिरी आवारगी ही मेरे होने की अलामत है मुझे फिर इस सफ़र के ब'अद भी कोई सफ़र देना

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 149   |  

    दिल कब आवारगी को भूला है ख़ाक अगर हो गया बगूला है

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 162   |  

    फैलती जा रही है ये दुनिया जश्न-ए-आवारगी मनाने में

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 169   |  

    Dil Ke Liye Dard Bhi Roz Naya Chahiye Zindagi To Hi Bata Kaise Jiya Chahiye Maano Meri Kazmi, Tum Ho Bhaley Aadmi Phir Wohi Aawargi, Kuch To Haya Chahiye…

    Share With
  • Nov 9, 2017   |   Review 179   |  

    जो अधूरा हो मगर फिर भी पूरा लगता हो सिवाय इश्क के है ऐसा कोई मुकाम नहीं

    Share With


Shayari Category 706



☰ View Category
× Close Category